इर्द-गिर्द

जल रही है, आग हम दोनों के इर्द-गिर्द।
सुलग रहा है,दिल आज हमदोनो के इर्द-गिर्द.
किसी ने जलते दिल के पास सिगरेट सुलगाई.
तड़प रहा था दिल किसी का इर्द-गिर्द।
समझाए कैसे दिल अब मान जा वो न आने वाली,
दिल तो झांकता है रास्ता मिल जाये सनम कही इर्द-गिर्द.
अब रास्ता मुश्किल दोनों एक दूजे से जुदा हो गए।
आ रही थी किसी की खुशबू हमारे घर के इर्द-गिर्द.
बेजान कागजो पर मुश्किल से होती है वास्ता तेरी.
हमारे तरर्फ है, क़ातिल दिल के जो फिरते है इर्द-गिर्द.

अवधेश कुमार राय “अवध”

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